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Vishav mai sarv sratsht sthan kiska hai

Aug 30, 2026

यह प्रश्न "विश्व में सर्वश्रेष्ठ स्थान किसका है" के उत्तर के रूप में दिए गए संदर्भों में सीधे तौर पर स्पष्ट रूप से संबोधित नहीं किया गया है। हालाँकि, जैन धर्म के अनुसार, सर्वोच्च स्थान सिद्धशिला (मोक्ष/निर्वाण का स्थान) को माना जाता है, जहाँ सभी सिद्ध (मुक्त आत्माएँ) निवास करती हैं। [2] में वर्णित स्तुति के अनुसार, यह स्थान "आनंदमय, अचल, रोगरहित, अनंत, अक्षय और अव्याबाध" है, जहाँ से लौटना नहीं होता — यही सर्वोच्च लक्ष्य है। [2]

इसके अतिरिक्त, जैन परंपरा में तीर्थंकरों और सिद्धों को सर्वोच्च पूजनीय माना गया है, और उनकी प्राप्ति का स्थान ही सर्वश्रेष्ठ है। यदि आपका प्रश्न किसी विशिष्ट तीर्थ या नगर के बारे में है, तो संदर्भों में श्रावस्ती जैसे नगरों का उल्लेख है, जो धार्मिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था [4], परंतु "सर्वश्रेष्ठ" की अवधारणा आध्यात्मिक दृष्टि से सिद्धशिला को ही दी जाती है।

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14 purvadhar and kevali mein kya antar hai

जैन परंपरा में **चौदह पूर्वधर** और **केवली** दोनों ही उच्च आध्यात्मिक अवस्थाएँ हैं, परंतु इनमें मूलभूत अंतर है। पूर्वधर वे आचार्य या श्रुतकेवली होते हैं जिन्हें चौदह पूर्व (पूर्व-रचित आगमों का ज्ञान) का संपूर्ण ज्ञान होता है, जबकि केवली को केवलज्ञान (सर्वज्ञता) प्राप्त होती है। केवली सभी पदार्थों और पर्यायों को एक साथ, प्रत्यक्ष रूप से जानते हैं, जबकि पूर्वधर श्रुतज्ञान (आगमों के अध्ययन) के आधार पर क्रमशः जानते हैं [3]। केवली दो प्रकार के होते हैं—**सयोगी केवली** (जिनमें मन, वचन और काया की क्रियाएँ रहती हैं) और **अयोगी केवली** (जिनमें सभी क्रियाएँ समाप्त हो जाती हैं) [1]। चौदहवें गुणस्थान (अयोगी केवली) में केवल सूक्ष्म शारीरिक क्रिया शेष रहती है, जो अंत में समाप्त हो जाती है [4]। पूर्वधर, जैसे गौतमस्वामी, सुधर्माचार्य और जम्बूस्वामी, क्रमशः केवली बने—ये अनुबद्ध केवली कहलाते हैं [3]। संक्षेप में, पूर्वधर श्रुतज्ञान के धारक हैं, जबकि केवली प्रत्यक्ष सर्वज्ञ हैं; केवली अवस्था पूर्वधर से उच्चतर है।

Mohaniya karm ki utkrust stithi kitni hai?

मोहनीय कर्म की उत्कृष्ट (अधिकतम) स्थिति 70 कोड़ा-कोड़ी सागरोपम है। [1] यह स्थिति बंध (Sthiti Bandha) के अंतर्गत आती है, जो कर्म बंधन की अवधि निर्धारित करती है। [1] अन्य कर्मों की तुलना में मोहनीय कर्म की स्थिति सबसे लंबी होती है। उदाहरण के लिए, ज्ञानावरणीय, दर्शनावरणीय और अंतराय कर्म की अधिकतम स्थिति 30 कोड़ा-कोड़ी सागरोपम है, जबकि वेदनीय कर्म की अधिकतम स्थिति 30 कोड़ा-कोड़ी सागरोपम है। [1] मोहनीय कर्म को सबसे खतरनाक कर्म माना जाता है क्योंकि इसी के कारण आत्मा के सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र में बाधा उत्पन्न होती है। [5]

Mandir nahi ja pana konsa karm hota hai

आपके प्रश्न का सीधा उत्तर इस ज्ञानकोष में स्पष्ट रूप से नहीं दिया गया है, लेकिन जैन दर्शन के सिद्धांतों के अनुसार, मंदिर न जाना अपने आप में कोई पाप या कर्म-बंधन का कारण नहीं है। जैन धर्म में कर्म-बंधन मुख्य रूप से हिंसा, झूठ, चोरी, असंयम और परिग्रह जैसे पाप कार्यों से होता है, न कि केवल मंदिर न जाने मात्र से। हालांकि, मंदिर जाना और तीर्थंकरों की पूजा करना आत्म-शुद्धि और सद्भावना के विकास के लिए लाभदायक माना गया है [3]। जैन ग्रंथों के अनुसार, मंदिर जाने का उद्देश्य तीर्थंकरों के प्रति सम्मान प्रकट करना और उनके दिखाए मार्ग पर चलने की प्रेरणा लेना है [3]। यदि कोई व्यक्ति शारीरिक अक्षमता या अन्य वैध कारणों से मंदिर नहीं जा पाता, तो यह पाप नहीं है। असली बात यह है कि व्यक्ति अपने मन, वाणी और शरीर की क्रियाओं के प्रति सजग रहे और समभाव (equanimity) का पालन करे, क्योंकि नए कर्मों का बंधन प्रतिक्रियाओं और राग-द्वेष से होता है [1]। यदि व्यक्ति जागरूकता (awareness) के साथ कार्य करता है, तो वह कर्म-बंधन से बच सकता है [2]। इसलिए, मंदिर न जाना उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि आत्म-जागरूकता और सदाचार का पालन करना।

In granthon mein diye gaye aayushya kya prithvi ke samyaanusaar hai ya phir devlok ke samyaanusaar

प्रदत्त सन्दर्भ में इस प्रश्न का सीधा उत्तर नहीं मिलता कि ग्रन्थों में दिए गए आयुष्य (जीवनकाल) पृथ्वी के समयानुसार हैं या देवलोक के समयानुसार। स्रोतों में ग्रन्थों की सूची, महाप्रत्याख्यान सूत्र की गाथाएँ, और भगवती सूत्र के कुछ अंश हैं, जिनमें आयुष्य की तुलना या समय-गणना का विवरण नहीं है। सामान्य जैन सिद्धान्त के अनुसार, विभिन्न ग्रन्थों में वर्णित आयुष्य अलग-अलग लोकों के समय-मान के अनुसार होते हैं। उदाहरण के लिए, देवताओं का आयुष्य सागरोपम (सागरोपम नामक विशाल समय-इकाई) में मापा जाता है, जबकि मनुष्यों का आयुष्य वर्षों में। इसलिए, किसी ग्रन्थ में वर्णित आयुष्य को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि वह किस जीव या लोक के सन्दर्भ में है। यदि आप किसी विशिष्ट ग्रन्थ या प्रसंग की बात कर रहे हैं, तो कृपया उसका नाम बताएँ, जिससे अधिक सटीक उत्तर दिया जा सके।

what are the words of the visahara phulinga mantra?

The Visahara Phulinga (also spelled Visahar Fullinga) mantra is a protective Jain hymn associated with Lord Parshvanatha. The core mantra is: **"Namiuna Pāsa Visahara Vasaha Jina Fulinga"** [1][5]. This is an 18-letter mantra considered effective against all types of pain and affliction, and it is implicit in stanza 18 of the Namiun Sutra [5]. There is also a longer version composed by Acharya Shri Mantung Suri that adds symbolic syllables: **"Om Rhim Shreem Arham Namiuna Pāsa Visahara Vasaha Jina Fuling Rhim Namaha"** [1][5]. In this version, "Om" symbolizes the five supreme entities, "Hrim" the three worlds, "Shrim" spiritual wealth, and "Arham" the worshipful one [5]. The mantra is said to pacify evil planetary effects, disease, epidemics, and acute fever when recited or held in the throat (remembered) [1][2][5].

visahara phulinga mantra

Based on the provided context, the "Visahara Phulinga" mantra is a hymn dedicated to Lord Pārsva Nātha, who is attended by the deity Pārsva Yaksha. The mantra is believed to eliminate disturbances in the universe and destroy the poison of snakes and cobras. Lord Pārsva Nātha is described as an abode of auspiciousness and prosperity. The context states that a person who always remembers this hymn will be rid of misfortunes, fatal diseases, epidemics, and deadly fevers. Even a simple obeisance offered to Lord Pārsva Nātha is said to result in many good things, and because of these prayers, human beings and animals will not suffer from sickness and poverty. Furthermore, upon attaining right faith as preached by him, which is considered more valuable than the most precious heavenly jewels, living beings can easily attain the place of immortality. The hymn concludes with a prayer to the greatly renowned Lord Parśvanātha to bestow the seeds of attaining perfect knowledge in all future births.